Sugar prices: देश में चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। सरकार का कहना है कि इस कदम से घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी और त्योहारों के दौरान कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
चीनी के दाम क्यों बढ़ रहे हैं?
Sugar prices: देश में पिछले कुछ समय से चीनी की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 20 अगस्त को खुदरा बाजार में चीनी की औसत कीमत करीब 55.70 रुपये प्रति किलो थी। एक महीने पहले यह 48.18 रुपये प्रति किलो थी।
चीनी की कीमत बढ़ने के पीछे कम उत्पादन, शुरुआती स्टॉक में कमी, मौसम और आने वाले त्योहारों में बढ़ने वाली मांग जैसे कई कारण बताए जा रहे हैं। जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के दौरान मिठाइयों और खाद्य पदार्थों में चीनी की मांग बढ़ जाती है।
Sugar prices: भारत में कितना चीनी उत्पादन और खपत?
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है। देश में हर साल करीब 30 से 35 मिलियन टन चीनी का उत्पादन होता है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक चीनी उत्पादन के प्रमुख राज्य हैं।
वहीं, भारत में हर साल करीब 28 से 28.5 मिलियन टन चीनी की घरेलू खपत होती है। मौजूदा 2025-26 सीजन में शुद्ध चीनी उत्पादन करीब 27.9 मिलियन टन रहने का अनुमान है। यानी उत्पादन घरेलू खपत से थोड़ा कम है।
करीब 10 साल बाद क्यों करना पड़ा आयात?
भारत में चीनी के आयात पर सामान्य तौर पर करीब 100 फीसदी शुल्क लगता है। इसके कारण बड़े स्तर पर चीनी का आयात बहुत कम होता है। उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, भारत को आखिरी बार 2016-17 में बड़े स्तर पर चीनी आयात करनी पड़ी थी। अब कीमतों में तेजी और घरेलू उपलब्धता को देखते हुए सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है।
क्या इथेनॉल नीति से चीनी महंगी हुई?
चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच इथेनॉल नीति भी चर्चा में है। भारत ने पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिलाने यानी E20 लक्ष्य को बढ़ावा दिया है। इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने के रस और molasses का इस्तेमाल किया जाता है।
एक ही गन्ने से चीनी और इथेनॉल दोनों बनाए जा सकते हैं। ऐसे में अगर गन्ने या उससे मिलने वाले ऐसे उत्पादों का ज्यादा इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में होता है, जिनसे चीनी भी बनाई जा सकती है, तो बाजार में चीनी की उपलब्धता कम हो सकती है।
मौजूदा सीजन में करीब 30 लाख टन चीनी उत्पादन को इथेनॉल की ओर मोड़े जाने की बात सामने आई है। यह कुल उत्पादन का करीब 10 फीसदी है। इसी वजह से आलोचक कह रहे हैं कि इथेनॉल नीति ने चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ाया है।
हालांकि, चीनी की महंगाई का कारण केवल इथेनॉल नीति को मानना सही नहीं होगा। कम उत्पादन, मौसम, शुरुआती स्टॉक में कमी और त्योहारों में बढ़ने वाली मांग भी कीमत बढ़ने की बड़ी वजह हैं। यानी इथेनॉल एक कारण हो सकता है, लेकिन पूरी समस्या की एकमात्र वजह नहीं है।
सरकार इथेनॉल को लेकर क्या कर सकती है?
चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार अगले सीजन में गन्ने के रस और B-heavy molasses से इथेनॉल बनाने पर सीमा लगाने के विकल्प पर विचार कर रही है। वहीं C-heavy molasses से इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है, क्योंकि इसमें चीनी का बड़ा हिस्सा पहले ही निकाला जा चुका होता है।
क्या चीनी के दाम तुरंत कम होंगे?
सरकार के आयात फैसले से बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन कीमतों में तुरंत बड़ी गिरावट की संभावना कम है। ब्राजील जैसे देशों से नई खेप भारत पहुंचने में करीब दो महीने लग सकते हैं। ऐसे में आयात का असर अक्टूबर के आसपास दिखाई दे सकता है।
सरकार ने थोक खरीदारों के लिए स्टॉक लिमिट भी तय की है। इसका उद्देश्य ज्यादा मात्रा में चीनी जमा करके कृत्रिम कमी पैदा करने की संभावना को रोकना है। सरकार को उम्मीद है कि आयात और स्टॉक पर नियंत्रण जैसे कदमों से त्योहारों के दौरान चीनी की कीमतों को काबू में रखा जा सकेगा।
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