जेरूसलम। 30 मार्च 2026 को इज़राइल की संसद (नेसेट) ने एक अत्यंत विवादास्पद इज़राइल मृत्युदंड कानून पारित किया है। यह नया कानून आतंकवादी घटनाओं और ‘राष्ट्रवादी’ इरादों से हत्या करने वाले फ़िलिस्तीनियों के लिए फांसी को डिफ़ॉल्ट सजा बनाता है। इस फैसले ने मध्य पूर्व की राजनीति में हड़कंप मचा दिया है और दशकों पुरानी इज़राइली न्याय प्रणाली को पूरी तरह बदल दिया है।
नेसेट में मतदान और मंत्री का विवादित जश्न
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की गठबंधन सरकार ने इस कठोर बिल को नेसेट में 62 के मुकाबले 48 वोटों के बहुमत से पारित करा लिया। इस विधेयक के मुख्य प्रस्तावक और अति-दक्षिणपंथी ‘ओत्ज़्मा येहुदित’ पार्टी के नेता, राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन गविर ने इस अवसर को अपनी एक बड़ी राजनीतिक जीत माना।
मतदान के तुरंत बाद मंत्री बेन गविर ने संसद के भीतर शैम्पेन की बोतल खोलकर इस कानून के पारित होने का जश्न मनाया। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने उनके इस कृत्य की कड़ी निंदा करते हुए इसे “मानवता से रहित” कदम करार दिया है।
सजा के कड़े नियम और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इज़राइल के इतिहास में मृत्युदंड का उपयोग हमेशा से बेहद दुर्लभ रहा है। देश के इतिहास में आखिरी नागरिक फांसी वर्ष 1962 में नाज़ी युद्ध अपराधी एडोल्फ इचमैन को दी गई थी। हालांकि राजद्रोह और युद्ध अपराधों के लिए मृत्युदंड का तकनीकी प्रावधान पहले से मौजूद था, लेकिन इसका व्यावहारिक उपयोग कभी नहीं किया गया। नया कानून इस नीति को जड़ से समाप्त करता है।
अंतरराष्ट्रीय निंदा और मानवाधिकार संगठनों की चिंताएं
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून पर गहरी चिंता व्यक्त की है। ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) ने इस कानून को “भेदभाव को मजबूत करने वाला और रंगभेद का प्रतीक” बताया है। यूरोपीय संघ के प्रवक्ता ने भी इसे मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन मानते हुए “स्पष्ट रूप से पीछे की ओर एक कदम” करार दिया है।
कानूनी जानकारों के अनुसार, यह कानून नागरिक अदालतों में तभी लागू होगा जब हत्या “इज़राइल राज्य के अस्तित्व को नकारने के इरादे से” की गई हो। यह विशिष्ट शब्दावली जानबूझकर इसलिए गढ़ी गई है ताकि यहूदी आतंकवादियों को मृत्युदंड के दायरे से बाहर रखा जा सके और इसे मुख्य रूप से फ़िलिस्तीनी निवासियों पर लागू किया जा सके। फ़िलिस्तीनी प्रिजनर्स क्लब के डेटा के अनुसार, 7 अक्टूबर 2023 के बाद से इज़राइली जेलों में 100 से अधिक फ़िलिस्तीनी कैदियों की मौत पहले ही हो चुकी है।
कूटनीतिक प्रभाव और सुप्रीम कोर्ट में कानूनी चुनौती
विश्लेषकों का मानना है कि मृत्युदंड के लागू होने से हमास और इज़राइल के बीच भविष्य में होने वाली ‘बंदी विनिमय’ की संभावनाएं लगभग समाप्त हो जाएंगी।
देश के भीतर भी सरकार को इस कानून के खिलाफ कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। अति रूढ़िवादी यहूदी दलों (Haredim) ने धार्मिक सिद्धांतों का हवाला देते हुए इस मृत्युदंड का विरोध किया था। विपक्षी नेता यायर लापिड की पार्टी और अरब बहुल ‘हदाश ताल’ इसे असंवैधानिक और “रंगभेद को संस्थागत बनाने वाला” मानते हैं। इन विपक्षी दलों ने इस कानून को इज़राइल के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर ली है।
इज़राइल का सुप्रीम कोर्ट और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस कानून पर क्या रुख अपनाते हैं — यह आने वाले हफ्तों में तय होगा।
यह भी पढ़ें:
