मध्य पूर्व तनाव: ईंधन और ऊर्जा संकट के बीच पीएम मोदी की हाई लेवल बैठक

नई दिल्ली | 22 मार्च 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर बढ़ते मध्य पूर्व तनाव के बीच देश की ऊर्जा सुरक्षा भारत सुनिश्चित करने के लिए कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी यानी CCS की उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता की। यह बैठक पेट्रोलियम, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, बिजली और उर्वरक क्षेत्रों में संभावित आपूर्ति संकट से निपटने के लिए बुलाई गई थी।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आयात निर्भरता

पश्चिम एशिया में चल रहे टकराव के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है। प्रधानमंत्री ने X पर लिखा कि सरकार नागरिकों को इस संघर्ष के प्रभाव से बचाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

भारत अपनी घरेलू आवश्यकता का लगभग 87.8% कच्चा तेल आयात करता है। यूरिया की कुल मांग का 25 से 30 प्रतिशत आयात से पूरा होता है जबकि पोटाश यानी MOP के लिए 100% विदेशी निर्भरता है। भारत का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व यानी SPR केवल 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है जो मात्र 9.5 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है। इसी जोखिम को देखते हुए सरकार रसायनों और फार्मास्यूटिकल्स के लिए वैकल्पिक आयात स्रोत तलाशने पर जोर दे रही है।

लाल सागर संकट और ईंधन आपूर्ति भारत पर असर

इज़राइल, ईरान और लाल सागर के आसपास केंद्रित भू-राजनीतिक अस्थिरता ने रेड सी क्राइसिस को जन्म दिया है। भारत का लगभग 80% मालवाहक व्यापार इसी मार्ग से यूरोप और पश्चिमी देशों के साथ होता है।

हूती विद्रोहियों के हमलों के कारण मालवाहक जहाजों को केप ऑफ गुड होप के लंबे रास्ते से गुजरना पड़ रहा है। इससे भारत की शिपिंग और मालभाड़े की लागत में 40 से 60 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है जिसका सीधा असर ईंधन आपूर्ति भारत पर पड़ रहा है।

कच्चे तेल की कीमतें और महंगाई का खतरा

परिवहन लागत बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें और FMCG उत्पादों की कीमतें बढ़ सकती हैं जिसका सीधा असर आम नागरिक की जेब पर पड़ेगा। भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार वैश्विक भू-राजनीतिक झटके और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान घरेलू महंगाई के लिए सबसे बड़े जोखिम बने हुए हैं।

पीएम मोदी ऊर्जा बैठक में लिए गए फैसले

सरकार ऊर्जा सुरक्षा कूटनीति के तहत रूस, लैटिन अमेरिका और अफ्रीकी देशों से कच्चे तेल के आयात को बढ़ावा दे रही है। यूरिया सब्सिडी योजना के तहत आवंटन को भी सुव्यवस्थित किया जा रहा है। NITI Aayog के अनुमान के अनुसार 2030 तक भारत की कुल ऊर्जा मांग में 35% की वृद्धि होने वाली है जिसे देखते हुए सरकार अक्षय ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन की दिशा में भी तेजी से काम कर रही है।

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