पुणे | महाराष्ट्र में लगातार बढ़ रहे मानव-तेंदुआ संघर्ष के बीच राज्य सरकार ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। रेस्क्यू सेंटर्स पर भारी दबाव और जगह की कमी के कारण महाराष्ट्र के पुणे जिले से वंतारा शिफ्ट हुए 25 तेंदुए अब गुजरात के जामनगर में एक नए और सुरक्षित माहौल में रहेंगे। राज्य के वन मंत्री गणेश नाइक ने 23 मार्च 2026 को विधान परिषद में इस स्थानांतरण की आधिकारिक पुष्टि की।
मानव-वन्यजीव संघर्ष: क्यों वंतारा शिफ्ट हुए 25 तेंदुए?
महाराष्ट्र में बीते कुछ वर्षों में वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों से जानवरों की आबादी तेजी से बढ़ी है, जिससे रिहायशी इलाकों और गन्ने के खेतों में तेंदुओं का आना आम हो गया है। विधानमंडल में पेश किए गए नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में राज्य में तेंदुओं की संख्या चार गुना हो चुकी है। इसी तरह, पिछले 7-8 सालों में महाराष्ट्र में बाघों की संख्या 101 से बढ़कर 444 हो गई है।
तेजी से बढ़ती इस आबादी के कारण जुन्नर के मणिकडोह जैसे रेस्क्यू सेंटर्स पर क्षमता से अधिक बोझ पड़ गया है। वन मंत्री के बयान के मुताबिक, केवल पुणे जिले में ही लगभग 150 तेंदुओं को रेस्क्यू सेंटर में रखना पड़ा था। इसी भारी दबाव को कम करने के उद्देश्य से 25 तेंदुओं को तत्काल राहत के तौर पर स्थानांतरित किया गया है। यह स्थानांतरण एक दीर्घकालिक समझौते का हिस्सा है, जिसके तहत कुल 50 तेंदुओं को वंतारा भेजा जाना है।
क्या है वंतारा और वहां कैसी हैं सुविधाएं?
गुजरात के जामनगर रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स के ग्रीन बेल्ट में स्थित ‘वंतारा’ रिलायंस फाउंडेशन द्वारा संचालित दुनिया का सबसे बड़ा पशु बचाव, उपचार और पुनर्वास केंद्र है। यह विशाल केंद्र लगभग 3,000 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के निदेशक अनंत अंबानी के नेतृत्व में तैयार किए गए इस केंद्र में जानवरों के लिए विश्वस्तरीय सुविधाएं मौजूद हैं। यहां लाए जाने वाले जानवरों के सटीक इलाज और गहन जांच के लिए MRI, सीटी स्कैन और ICU जैसी अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं।
सरकार का तर्क है कि राज्य के भीड़भाड़ वाले और संसाधनों की कमी से जूझ रहे केंद्रों की तुलना में यहां भेजे गए जानवर अधिक वैज्ञानिक देखभाल प्राप्त कर सकेंगे। इसके साथ ही उन्हें बड़े बाड़ों में प्राकृतिक वातावरण के करीब रहने का मौका मिलेगा।
वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट में अहम संशोधन
इस पूरी स्थानांतरण प्रक्रिया को कानूनी रूप से सरल बनाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने ‘वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन (महाराष्ट्र अमेंडमेंट) बिल, 2026’ पारित किया है। 1972 के मूल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के अनुसार, अनुसूची-1 में आने वाले किसी भी जानवर — जैसे तेंदुआ — को स्थानांतरित करने के लिए पहले केंद्र सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य था, जो एक लंबी और जटिल प्रक्रिया मानी जाती थी।
नए संशोधन के लागू होने के बाद अब राज्य के ‘चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन’ सीधे राज्य सरकार की अनुमति से ऐसे फैसले ले सकेंगे। वन मंत्री गणेश नाइक ने सदन में स्पष्ट किया कि इस नए कानून का अर्थ तेंदुओं के शिकार या उन्हें मारने की अनुमति देना बिल्कुल नहीं है — यह केवल वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए है। फिलहाल इस बिल को पूरी तरह कानून बनने के लिए राज्यपाल और राष्ट्रपति की अंतिम मंजूरी का इंतजार है।
विशेषज्ञों की राय और निजीकरण की चिंताएं
इस कदम पर वन्यजीव विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। मुंबई के वन्यजीव विशेषज्ञ कृष्ण तिवारी का मानना है कि मानव-पशु संघर्ष को कम करने के लिए तत्काल कदम उठाना जरूरी था। हालांकि, उनका यह भी कहना है कि स्थानांतरण के बाद इन तेंदुओं के मनोवैज्ञानिक और शारीरिक व्यवहार का गहराई से अध्ययन किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, कई पर्यावरणविदों ने इस प्रक्रिया पर गहरी चिंता जताई है। उनका तर्क है कि वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट में संशोधन करके वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास या राज्य की कस्टडी से निकालकर निजी कॉर्पोरेट सुविधाओं में भेजना “वन्यजीवों के निजीकरण” को बढ़ावा दे सकता है। आलोचकों को आशंका है कि इस तरह के कदमों से देश में संरक्षण का मौजूदा कानूनी ढांचा कमजोर पड़ सकता है।
भारत में वन्यजीव प्रबंधन और मानव-पशु संघर्ष के समाधान की दिशा में कॉर्पोरेट और राज्य की भागीदारी (PPP मॉडल) का यह एक नया उदाहरण है। यदि राष्ट्रपति से इस नए बिल को मंजूरी मिल जाती है, तो अन्य राज्य भी अपनी वन्यजीव आबादी के प्रबंधन के लिए इसी तरह के कानूनी बदलावों की ओर रुख कर सकते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वंतारा शिफ्ट हुए 25 तेंदुए अपने नए माहौल में किस प्रकार ढलते हैं और इससे महाराष्ट्र में मानव-तेंदुआ संघर्ष में कितनी कमी आती है।
Related Articles:
