नई दिल्ली | Taaza Khabar Desk. — अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे भयंकर युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित हुई है, जिसके परिणामस्वरूप रूस की तेल कमाई में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने और कच्चे तेल की कीमतों में 38% के भारी उछाल के बीच, मास्को हर दिन लगभग 760 मिलियन डॉलर (करीब 7,150 करोड़ रुपये) का भारी मुनाफा कमा रहा है।

ईरान युद्ध से रूस की तेल कमाई में ऐतिहासिक उछाल
ईरान द्वारा खाड़ी से तेल का प्रवाह रोके जाने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार गहरे संकट में है। इस कमी को पूरा करने के लिए रूसी तेल की मांग आसमान छू रही है। स्थिति यह है कि इस महीने रूस की तेल और गैस की बिक्री 12 बिलियन डॉलर से दोगुनी होकर 24 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।
बाजार की स्थिति को देखते हुए, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूसी तेल पर से प्रतिबंधों में अस्थायी छूट दिए जाने से रूस के लिए वैश्विक बाजारों में अपना कच्चा तेल बेचना और भी आसान हो गया है। कीव स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और अन्य वैश्विक संस्थाओं के डेटा से यह स्पष्ट होता है कि संकट के समय में रूस को भारी आर्थिक लाभ मिल रहा है।
| वैश्विक ऊर्जा बाजार के प्रमुख आंकड़े | वर्तमान स्थिति (2026) |
|---|---|
| ब्रेंट क्रूड की कीमत में उछाल | 38% की वृद्धि (लगभग $100 प्रति बैरल) |
| रूस का दैनिक तेल मुनाफा | $760 मिलियन (लगभग 7,150 करोड़ रुपये) |
| रूस की मासिक तेल और गैस बिक्री | दोगुनी होकर $24 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान |
शैडो फ्लीट और प्रतिबंधों की विफलता
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से ही पश्चिमी देशों ने मास्को पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। कई भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान स्थिति में रूस को मिली यह ढील पश्चिमी देशों की रणनीतिक हार है। आलोचकों का स्पष्ट तर्क है कि G7 देशों द्वारा लागू किया गया ‘प्राइस कैप’ तंत्र पूरी तरह से विफल हो गया है।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की रिपोर्ट के अनुसार, आज रूस का लगभग 65% कच्चा तेल ‘शैडो फ्लीट’ (पुराने और गैर-पंजीकृत टैंकरों) के जरिए बिना किसी पश्चिमी निगरानी के ग्राहकों तक पहुंच रहा है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करने के पश्चिमी प्रयास जमीनी हकीकत से काफी दूर रहे हैं।
भारत का तेल आयात और द्विपक्षीय व्यापार रणनीति
मध्य पूर्व के इस नवीनतम संकट ने भारत के ऊर्जा सुरक्षा मॉडल को सीधी चुनौती दी है। परंपरागत रूप से खाड़ी देशों के तेल पर निर्भर भारत के लिए आपूर्ति का रुकना एक बड़ी चिंता का विषय है। यदि ईरान युद्ध लंबा खिंचता है, तो भारत को फिर से रूसी तेल पर अपनी निर्भरता भारी मात्रा में बढ़ानी पड़ सकती है।
आंकड़े बताते हैं कि यूक्रेन युद्ध की शुरुआत से जनवरी 2026 तक भारत ने रूस से 144 बिलियन यूरो (लगभग 13 लाख करोड़ रुपये) का जीवाश्म ईंधन खरीदा है। पश्चिमी प्रणालियों से कटने के बाद, भारत और रूस ने अपने व्यापार को सुचारू रखने के लिए नए रास्ते निकाले हैं।
अमेरिकी नीति में बदलाव और विशेषज्ञों की चेतावनी
इस अप्रत्याशित वृद्धि और अमेरिकी नीतियों में बदलाव पर अर्थशास्त्रियों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। पूर्व IMF मुख्य अर्थशास्त्री साइमन जॉनसन ने ट्रंप की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा है कि इससे विश्व की तेल कीमतों पर कोई खास राहत नहीं मिलेगी, बल्कि यह कदम रूस की तेल कमाई को प्रति बैरल बहुत बढ़ा देता है, जिससे दुश्मनों की जेब में पैसा जा रहा है।
दूसरी ओर, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए अपनी कंपनियों को आगाह किया है कि वे इस अतिरिक्त राजस्व को व्यर्थ न गँवाएं और बदलते बाजार में विवेकपूर्ण बने रहें। रूसी बीमा कंपनियों को भारत सरकार से अनुमति मिलने के कारण भी कच्चे तेल का शिपमेंट अधिक सुचारू रूप से हो पा रहा है।
ईरान युद्ध के कारण पैदा हुआ यह ऊर्जा संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था में महंगाई का नया दौर ला सकता है। ऐसे समय में जब कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, रूस की तेल कमाई में यह रिकॉर्ड वृद्धि उसे पश्चिमी प्रतिबंधों से जूझ रही अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और यूक्रेन में सैन्य अभियानों को निर्बाध रूप से जारी रखने में अहम मदद प्रदान करेगी। आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या भारत इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल का उपयोग सुरक्षित आपूर्ति के लिए नए विकल्प तलाशने में करता है या रियायती रूसी तेल पर अपनी निर्भरता और बढ़ाता है।
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