नई दिल्ली | Taaza Khabar Desk. 24 मार्च 2026 को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने अपने नए और ऐतिहासिक NASA Skyfall Mission की घोषणा की है। इस महत्वाकांक्षी मिशन के तहत दिसंबर 2028 में मंगल ग्रह की ओर दुनिया का पहला परमाणु संचालित (Nuclear Powered) इंटरप्लेनेटरी स्पेसक्राफ्ट लॉन्च किया जाएगा। यह मिशन मंगल ग्रह पर पानी की खोज और भविष्य के मानव मिशनों के लिए सुरक्षित लैंडिंग साइट्स का पता लगाने के लिए अपने साथ हेलीकॉप्टरों का एक विशेष बेड़ा भी ले जाएगा।

NASA Skyfall Mission और स्पेस रिएक्टर-1 फ्रीडम
NASA Skyfall Mission का सबसे प्रमुख हिस्सा इसका अत्याधुनिक स्पेसक्राफ्ट है, जिसे ‘स्पेस रिएक्टर-1 फ्रीडम’ का नाम दिया गया है। यह स्पेसक्राफ्ट न्यूक्लियर इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन (NEP) तकनीक पर काम करेगा। पारंपरिक रासायनिक रॉकेटों के विपरीत, यह एक छोटे परमाणु विखंडन (Nuclear Fission) रिएक्टर से बिजली उत्पन्न करके अपने आयन थ्रस्टर्स को ऊर्जा प्रदान करेगा। अंतरिक्ष में लॉन्च होने के मात्र 48 घंटे के भीतर ही इस न्यूक्लियर रिएक्टर को पूरी तरह से सक्रिय कर दिया जाएगा। स्पेसक्राफ्ट के निर्माण को गति देने के लिए इसमें ‘लूनर गेटवे’ प्रोग्राम के लिए तैयार किए गए पावर और प्रोपल्शन एलिमेंट के मौजूदा हार्डवेयर का दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है।
मंगल ग्रह पर स्काईफॉल हेलीकॉप्टरों का काम
इस स्पेसक्राफ्ट के साथ मंगल ग्रह पर खास हेलीकॉप्टरों का एक पूरा झुंड भेजा जाएगा। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये ‘स्काईफॉल’ हेलीकॉप्टर मंगल के वायुमंडल में उतरते समय बिना किसी पारंपरिक स्काई क्रेन के सीधे प्रवेश कर सतह पर लैंड करेंगे। इन हेलीकॉप्टरों का उन्नत डिज़ाइन नासा के ‘इंजेन्यूटी’ हेलीकॉप्टर की सफलता से प्रेरित होकर तैयार किया गया है। इंजेन्यूटी ने 2021 से 2024 के बीच मंगल ग्रह के पतले वायुमंडल में 72 सफल उड़ानें भरकर एक नया इतिहास रचा था।
नासा के स्पेस रिएक्टर्स ऑफिस के कार्यक्रम कार्यकारी स्टीव सिनाकोर के अनुसार, ये हेलीकॉप्टर सतह के नीचे मौजूद पानी का आकार, गहराई और उसकी विशेषताएं मापने के लिए ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार और उच्च तकनीक वाले कैमरे ले जाएंगे। यह सटीक डेटा भविष्य में मंगल पर उतरने वाले इंसानों के लिए सुरक्षित लैंडिंग साइट्स खोजने और ढलानों के खतरों को पहले से समझने में अत्यधिक मददगार साबित होगा।
अंतरिक्ष में परमाणु ऊर्जा का इतिहास और इसका प्रभाव
अंतरिक्ष अन्वेषण में परमाणु ऊर्जा का उपयोग करने का नासा का यह कदम अचानक नहीं उठाया गया है। नासा ने अपना सबसे पहला फ्लाइट रिएक्टर ‘SNAP-10A’ वर्ष 1965 में लॉन्च किया था। तब से लेकर आज तक अंतरिक्ष परमाणु कार्यक्रमों के विकास पर 20 बिलियन डॉलर से अधिक का भारी निवेश किया जा चुका है। मंगल ग्रह पर आने वाले भयंकर धूल भरे तूफानों के दौरान पारंपरिक सौर पैनल काम करना बंद कर देते हैं, ऐसे में वहां के चुनौतीपूर्ण वातावरण में परमाणु ऊर्जा ही एकमात्र निरंतर और विश्वसनीय ऊर्जा का स्रोत बचती है।
इस नई परमाणु तकनीक का एक और सबसे बड़ा फायदा मंगल ग्रह तक पहुँचने के यात्रा समय में होने वाली भारी कटौती है। आमतौर पर पारंपरिक रासायनिक रॉकेटों के माध्यम से मंगल ग्रह तक पहुँचने में 7 से 9 महीने का लंबा समय लगता है। लेकिन न्यूक्लियर इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन (NEP) तकनीक के इस्तेमाल से इस यात्रा के समय में कम से कम 25% तक की कमी आ सकती है, जिससे अंतरिक्ष यात्रियों और उपकरणों को कम समय तक रेडिएशन का सामना करना पड़ेगा।
मिशन की चुनौतियाँ और भविष्य के नीतिगत बदलाव
यह मिशन मंगल ग्रह पर मानव बस्तियां बसाने (Artemis program का विस्तार) की दिशा में एक बहुत बड़ा और निर्णायक कदम है। वहां मिलने वाले पानी का उपयोग भविष्य में पीने, ऑक्सीजन बनाने और यहाँ तक कि धरती पर वापसी की यात्रा के लिए रॉकेट ईंधन (propellant) निर्मित करने में किया जा सकेगा। नासा के प्रशासक जेरेड इसाकमैन भी इस न्यूक्लियर इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन तकनीक के प्रबल समर्थक हैं और इसे अंतरिक्ष यात्रा के भविष्य के रूप में देखते हैं।
हालांकि, इस मिशन के साथ कई बड़ी चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। अंतरिक्ष में परमाणु रिएक्टर (Nuclear reactor) को ले जाने से विकिरण (radiation) का खतरा हमेशा बना रहता है, खासकर लॉन्च के समय किसी अप्रत्याशित दुर्घटना की स्थिति में। कुछ अंतरिक्ष विश्लेषकों का यह भी मानना है कि 2028 तक इसे सफलतापूर्वक पूरा करने की समय सीमा अत्यंत महत्वाकांक्षी साबित हो सकती है। इसके बावजूद, यह ‘SR-1 फ्रीडम’ मिशन भविष्य के विखंडन शक्ति प्रणालियों (fission power systems) के लिए अंतरिक्ष कानून में नए विनियामक और सुरक्षा प्रोटोकॉल (Safety Protocols) स्थापित करेगा।
दिसंबर 2028 में लॉन्च होने के बाद यदि नासा स्काईफॉल मिशन अपनी तय योजना के अनुसार 2029 के अंत तक मंगल ग्रह पर सफलतापूर्वक पहुँच जाता है, तो यह मानव इतिहास में एक नई ‘परमाणु क्रांति’ की शुरुआत करेगा। नासा स्काईफॉल मिशन से हासिल होने वाली यह उन्नत तकनीक और डेटा भविष्य में मानव सभ्यता के लिए सौर मंडल के सबसे सुदूर हिस्सों, जैसे बृहस्पति के चंद्रमाओं तक पहुँचने का एक स्थायी और सुरक्षित मार्ग प्रशस्त करेगा।
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