“यह सही कदम था”: राज्यसभा में एस जयशंकर ने ईरानी जहाज को कोच्चि में रुकने देने पर क्या कहा?

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोमवार को राज्यसभा में स्पष्ट किया कि मानवीय आधार पर ईरानी नौसेना के जहाज आईआरआईएस लवान (IRIS Lavan) को कोच्चि बंदरगाह पर रुकने की अनुमति दी गई थी। ईरान-इजरायल युद्ध के बीच भारत के इस कदम पर देश-विदेश में चर्चा हो रही है। जानिए क्यों लिया गया यह फैसला और इसके क्या मायने हैं।

ईरान-इजरायल तनाव और भारत का रुख

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने राज्यसभा में मध्य पूर्व में जारी ईरान-इजरायल संघर्ष पर विस्तार से अपना पक्ष रखा। इसी दौरान उन्होंने उस बहस पर भी स्थिति साफ की, जिसमें यह सवाल उठाया जा रहा था कि भारत ने एक ईरानी नौसेना जहाज को अपने बंदरगाह पर शरण क्यों दी।

जयशंकर ने दो टूक कहा कि केरल के कोच्चि बंदरगाह पर आईआरआईएस लवान को रुकने देना मानवीय दृष्टिकोण से “बिल्कुल सही कदम” था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय किसी राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि पूरी तरह स्वतंत्र सोच और मानवता की भावना से लिया गया।

ईरानी जहाज कोच्चि कैसे पहुंचा?

मार्च 2026 की शुरुआत में जब ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच संघर्ष अपने चरम पर था, उसी दौरान ईरानी नौसेना के तीन जहाज हिंद महासागर में मौजूद थे। ये जहाज भारत द्वारा आयोजित ‘मिलन’ नौसैनिक अभ्यास और अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू में भाग लेने के लिए इस क्षेत्र में आए थे।

युद्ध के अचानक भड़क उठने से ये जहाज विषम परिस्थितियों में फंस गए। जयशंकर के शब्दों में, “वे गलत वक्त पर, गलत जगह फंस गए।” संसद में उन्होंने बताया कि इन तीन जहाजों में से एक आईआरआईएस देना (IRIS Dena) इस संघर्ष के दौरान नष्ट हो गया, जिसे अमेरिकी नौसेना की कार्रवाई का परिणाम बताया जा रहा है।

28 फरवरी को आया आपातकालीन संदेश

जयशंकर ने संसद को बताया कि 28 फरवरी को भारत को ईरान की तरफ से एक आपातकालीन संदेश मिला। उस समय भारतीय जलसीमा के सबसे नजदीक मौजूद जहाज आईआरआईएस लवान को तकनीकी खराबी सहित कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। ईरान ने इस जहाज को किसी सुरक्षित बंदरगाह पर लंगर डालने की अनुमति मांगी।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत ने 1 मार्च को यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। इसके बाद 4 मार्च को आईआरआईएस लवान सुरक्षित रूप से कोच्चि बंदरगाह पर पहुंचा। जहाज पर सवार लगभग 183 नाविकों और कई युवा कैडेट्स को सुरक्षित उतारा गया। इन सभी को फिलहाल समीपवर्ती भारतीय नौसेना केंद्रों में ठहराया गया है।

“इंसानियत कानून से बड़ी है”

जयशंकर ने सदन में कहा, “हमने इस स्थिति को केवल कानूनी नजरिए से नहीं, बल्कि पूरी तरह मानवता के नजरिए से देखा। जब कोई जहाज संकट में हो और मदद मांगे, तो उसकी सहायता करना ही सबसे सही काम है। मुझे पूरा यकीन है कि हमने सही फैसला किया।”

यह बयान न केवल भारत की कूटनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में किसी एक पक्ष का साथ लिए बिना, मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देता है।

शांति और कूटनीति की अपील

विदेश मंत्री ने ईरान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इस युद्ध से पूरे क्षेत्र का जनजीवन और व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। भारत ने एक बार फिर सभी पक्षों से शांति बनाए रखने, संयम बरतने और बातचीत व कूटनीति के जरिए विवाद सुलझाने की अपील दोहराई है।

भारत की स्वतंत्र और मानवीय कूटनीति

आईआरआईएस लवान को कोच्चि में शरण देना भारत की उस परंपरा का हिस्सा है जिसमें वह हमेशा मानवता को राजनीति से ऊपर रखता आया है। यह कदम दर्शाता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करते हुए, संकट की घड़ी में इंसानियत को सर्वोपरि मानता है — और यही उसकी असली ताकत है।

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