नई दिल्ली, 17 मार्च 2026 | Taaza Khabar Desk. देश में पुलिस महानिदेशकों (DGP) की नियुक्ति को लेकर राज्य सरकारों और न्यायपालिका के बीच चल रहे लंबे टकराव में एक निर्णायक मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 5 फरवरी 2026 को एक्टिंग DGP की नियुक्ति को पूरी तरह अवैध घोषित किया और 12 मार्च 2026 को 6 राज्यों को अदालत की अवमानना की चेतावनी दी। अब राज्य सरकारें नियुक्ति प्रक्रिया में देरी पर सीधे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जवाबदेह होंगी।
एक्टिंग DGP अब पूरी तरह गैरकानूनी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून में एक्टिंग DGP जैसी कोई अवधारणा अस्तित्व में ही नहीं है। अदालत ने इसे प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) के ऐतिहासिक फैसले का सीधा उल्लंघन करार दिया।
12 मार्च 2026 को UPSC की रिपोर्ट मिलने के बाद अदालत ने उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब, तेलंगाना, झारखंड और पश्चिम बंगाल को prima facie contempt of court की चेतावनी दी। इन राज्यों को 14 दिनों के भीतर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया गया।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि UPSC के पास राज्यों की देरी को माफ करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
नए DGP Appointment Rules — UPSC के दिशा-निर्देश
| चयन मापदंड | नियम और शर्त |
|---|---|
| न्यूनतम सेवा अनुभव | 25 वर्ष (2023 में 30 वर्ष से घटाया गया) |
| बची हुई सेवा अवधि | सेवानिवृत्ति से कम से कम 6 महीने शेष |
| पैनल भेजने की समय सीमा | कार्यकाल समाप्ति से 3 महीने पहले |
| नियुक्ति प्रक्रिया | UPSC द्वारा शॉर्टलिस्ट 3 अधिकारियों में से एक का चयन |
| न्यूनतम कार्यकाल | 2 वर्ष — सेवानिवृत्ति की तारीख से स्वतंत्र |
केंद्र सरकार ने Single Window System भी लागू किया है जिससे राज्य UPSC को डिजिटल माध्यम से proposals भेज सकें।
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प्रकाश सिंह केस (2006) — पुलिस सुधार की पृष्ठभूमि
यह पूरी कानूनी लड़ाई उत्तर प्रदेश और असम के पूर्व DGP प्रकाश सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ी है। 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधारों पर 7 ऐतिहासिक निर्देश जारी किए थे, जिनमें DGP नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप समाप्त करना सबसे प्रमुख था।
2018 में अदालत ने एक्टिंग DGP नियुक्तियों पर स्पष्ट रोक लगाई। फिर भी 2021 की Commonwealth Human Rights Initiative रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश राज्य इन नियमों को तोड़ते रहे। उस समय केवल अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड ही निर्देशों का पूरी तरह पालन कर रहे थे।
राज्यों का तर्क — संघवाद बनाम न्यायिक निर्देश
कई राज्य सरकारें इन नियमों को अपने संघीय अधिकारों का उल्लंघन मानती हैं। उनका तर्क है कि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 2 के तहत पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था राज्य के विषय हैं।
झारखंड और उत्तर प्रदेश ने अपने राज्य पुलिस अधिनियम बनाए हैं जबकि पंजाब का कानून राष्ट्रपति की मंजूरी न मिलने से अटका हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब तक राज्य कोई संवैधानिक रूप से वैध कानून नहीं बनाते, अनुच्छेद 141 और 142 के तहत उसके निर्देश पूरे देश में बाध्यकारी रहेंगे। किसी भी परिस्थिति में एक्टिंग DGP की नियुक्ति स्वीकार नहीं की जाएगी।
